विश्व स्ट्रोक दिवस: स्ट्रोक के लक्षण दिखते ही मरीज को पहुंचाएं अस्पताल, हर मिनट है महत्वपूर्ण
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सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में एक साल में 113 मरीजों को थ्रॉम्बोलाइसिस उपचार, युवाओं में भी बढ़ रहा खतरा
उदयपुर, 28 अक्टूबर: स्ट्रोक के दौरान उपचार में होने वाली देरी मस्तिष्क को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है। समय पर अस्पताल पहुंचने से आजीवन विकलांगता का खतरा कम किया जा सकता है। विश्व स्ट्रोक दिवस पर सुपर स्पेशलिटी अस्पताल के विशेषज्ञों ने आमजन से लक्षण पहचानते ही मरीज को अस्पताल की आपातकालीन सेवा में पहुंचाने की अपील की। अस्पताल में पिछले एक वर्ष के दौरान स्ट्रोक के 113 मरीजों को थ्रॉम्बोलाइसिस उपचार दिया गया।
न्यूरोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. तरुण कुमार रालोत के अनुसार, स्ट्रोक अब केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं है। धूम्रपान, शराब, मोटापा, तनाव, शारीरिक निष्क्रियता और अनियंत्रित रक्तचाप जैसे कारण युवाओं में भी इसका खतरा बढ़ा रहे हैं। अस्पताल की आपातकालीन सेवा में प्रतिदिन तीन से चार संभावित स्ट्रोक मरीज पहुंचते हैं।
चेहरा टेढ़ा होना और बोलने में परेशानी प्रमुख संकेत
स्ट्रोक के लक्षण पहचानने के लिए फास्ट पद्धति अपनाई जा सकती है। इसमें चेहरे का एक तरफ लटकना, हाथ या पैर में अचानक कमजोरी अथवा सुन्नपन और बोलने या बात समझने में परेशानी प्रमुख संकेत हैं। इनमें से कोई भी लक्षण दिखे तो तुरंत अस्पताल पहुंचाएं। लक्षण कुछ देर बाद ठीक हो जाएं, तब भी जांच में देरी न करें।
समय पर उपचार से नुकसान कम करने में मदद
थ्रॉम्बोलाइसिस में रक्त वाहिका में बने थक्के को घोलने के लिए विशेष दवाएं दी जाती हैं। यह उपचार निर्धारित समय सीमा और चिकित्सकीय मानकों के भीतर पात्र मरीजों को ही दिया जाता है। स्ट्रोक का कारण थक्का या मस्तिष्क में रक्तस्राव होना हो सकता है, इसलिए जांच के आधार पर उपचार तय किया जाता है। विशेषज्ञों ने नियमित व्यायाम, संतुलित आहार तथा रक्तचाप, मधुमेह और कोलेस्ट्रॉल पर नियंत्रण रखने की सलाह दी। अस्पताल में न्यूरोलॉजी, रेडियोलॉजी, न्यूरोसर्जरी और पुनर्वास विशेषज्ञों की समन्वित टीम मरीजों के उपचार में सहयोग करती है।

