कभी सूखा, कभी बाढ़ और अब अदृश्य प्रदूषण… मध्यम शहरों के सामने नया जल संकट
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डॉ. अनिल मेहता बोले—जल सुरक्षा के लिए बांध-पाइपलाइन ही नहीं, पहाड़ी, जलग्रहण, नदी, झील से लेकर भूजल पुनर्भरण तक पूरे जल-चक्र को बचाना होगा
उदयपुर, 3 सितंबर: मध्यम आकार के शहर आज जल संकट के ऐसे दौर से गुजर रहे हैं, जहां एक तरफ लंबे समय तक सूखा और दूसरी ओर थोड़े समय में अत्यधिक बारिश से बाढ़ की स्थिति बन रही है। इसके साथ पानी की गुणवत्ता भी लगातार प्रभावित हो रही है। जल संकट का समाधान केवल बांध, पाइपलाइन और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाने से नहीं होगा। इसके लिए पहाड़ियों, जलग्रहण क्षेत्रों, नदियों, झीलों, भूजल और वर्षाजल के पूरे चक्र को सुरक्षित करना होगा।
यह बात विद्या भवन पॉलिटेक्निक कॉलेज के प्राचार्य एवं पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति के सदस्य डॉ. अनिल मेहता ने ऑस्ट्रेलिया इंडिया वॉटर सेंटर की अंतरराष्ट्रीय ‘वॉटर टॉक्स’ वेबिनार में कही। उन्होंने ‘भारत के मध्यम आकार के शहरों में जल स्थिरता की उभरती चुनौतियां—उदयपुर से सीखें और अंतर्दृष्टियां’ विषय पर मुख्य वक्तव्य दिया।
डॉ. मेहता ने कहा कि देश में एक लाख से दस लाख आबादी वाले सवा चार सौ से अधिक मध्यम शहर तेजी से बदल रहे हैं। अनियोजित शहरीकरण और जलग्रहण क्षेत्रों के क्षरण से बारिश का पानी जमीन में जाने के बजाय तेजी से बह रहा है। इससे बरसात में बाढ़ और गर्मियों में भूजल संकट दोनों बढ़ रहे हैं।
उदयपुर में 41 उभरते प्रदूषक मिले
उन्होंने बताया कि उदयपुर के जल तंत्र में हुए अध्ययनों में 41 उभरते प्रदूषकों की मौजूदगी और 30 की मात्रात्मक पहचान हुई। इनमें 19 सक्रिय औषधीय तत्व, 2 व्यक्तिगत देखभाल उत्पाद, 6 स्टेरॉयड हार्मोन और 3 औद्योगिक प्रदूषक शामिल थे।
डॉ. मेहता ने कहा कि “उदयपुर कोई हाइड्रोलॉजिकल आइलैंड नहीं है।” शहर की प्रशासनिक सीमा पानी के प्रवाह की सीमा नहीं हो सकती। इसलिए जल प्रबंधन वार्डों के बजाय जलग्रहण और नदी बेसिन के आधार पर भी समझना होगा।
आयड़ नदी का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि नदी को नाला बना देना आसान हो सकता है, लेकिन इससे पारिस्थितिकी जटिल हो जाती है। प्राकृतिक प्रक्रियाओं को मजबूत करने वाली तकनीक, वैज्ञानिक समझ और नागरिक भागीदारी से ही जल तंत्र को फिर से स्वस्थ बनाया जा सकता है।
वेबिनार में ऑस्ट्रेलिया के वेस्टर्न सिडनी यूनिवर्सिटी के डॉ. इयान राइट ने घरेलू वर्षाजल टंकियों में सीसा, आर्सेनिक और पीएफएएस जैसे प्रदूषकों पर शोध निष्कर्ष रखे। एआईडब्ल्यूसी निदेशक प्रो. बसंत माहेश्वरी सहित भारत-ऑस्ट्रेलिया के अनेक जल विशेषज्ञों ने भाग लिया।

