2.90 लाख मामलों का बोझ, 500 किमी की दूरी और 40 साल का संघर्ष: आखिर उदयपुर को हाईकोर्ट बैंच कब?
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मेवाड़-वागड़ की जनता आज भी न्याय के लिए जोधपुर जाने को मजबूर
सुभाष शर्मा
उदयपुर, 8 मई: दक्षिण राजस्थान के लाखों लोगों की बहुप्रतीक्षित मांग — उदयपुर में राजस्थान हाईकोर्ट की बैंच — आज भी अधूरी है। जबकि उदयपुर संभाग से जुड़े करीब 2.90 लाख मामले विभिन्न अदालतों में लंबित बताए जा रहे हैं और हजारों वादकारियों को हर सुनवाई के लिए सैकड़ों किलोमीटर दूर जोधपुर जाना पड़ता है। पिछले करीब चार दशकों से अधिवक्ता, सामाजिक संगठन और जनप्रतिनिधि लगातार आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन अब तक सरकार और न्यायिक तंत्र की ओर से कोई ठोस निर्णय सामने नहीं आया है।
राजस्थान हाईकोर्ट की मुख्य पीठ जोधपुर में है और जयपुर में इसकी खंडपीठ संचालित होती है। ऐसे में उदयपुर, राजसमंद, चित्तौड़गढ़, सलूंबर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर और प्रतापगढ़ सहित पूरे दक्षिण राजस्थान के लोगों को न्याय के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। कई मामलों में गरीब, आदिवासी और ग्रामीण परिवारों को केवल तारीख पर पेश होने के लिए हजारों रुपए खर्च करने पड़ते हैं।
न्याय से पहले सफर की सजा
दक्षिण राजस्थान के आदिवासी इलाकों से जोधपुर की दूरी 450 से 500 किलोमीटर तक है। कई वादकारी रातभर बसों और ट्रेनों में सफर कर हाईकोर्ट पहुंचते हैं। अधिवक्ताओं का कहना है कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह व्यवस्था “न्याय से पहले सजा” जैसी बन गई है।
हाईकोर्ट बैंच संघर्ष समिति का तर्क है कि जब जयपुर में खंडपीठ स्थापित हो सकती है, तो भौगोलिक दृष्टि से विशाल और जनसंख्या की दृष्टि से महत्वपूर्ण दक्षिण राजस्थान को यह सुविधा क्यों नहीं मिल सकती।
राजस्थान गठन से पहले उदयपुर में थी उच्च न्यायिक व्यवस्था
इतिहासकारों और विधि विशेषज्ञों के अनुसार राजस्थान के एकीकरण से पहले मेवाड़ राज्य में उदयपुर प्रशासनिक और न्यायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण केंद्र था। तत्कालीन रियासतों में अलग-अलग उच्च न्यायिक व्यवस्थाएं थीं। राजस्थान गठन के बाद जोधपुर को हाईकोर्ट मुख्यालय बनाया गया, लेकिन उदयपुर की न्यायिक महत्ता समय के साथ भी बनी रही। यही कारण है कि यहां हाईकोर्ट बैंच की मांग केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि ऐतिहासिक आधार पर भी मजबूत मानी जाती है।
40 वर्षों से आंदोलन, हर महीने होता है कार्य बहिष्कार
उदयपुर में हाईकोर्ट बैंच की मांग को लेकर आंदोलन करीब 40 साल पुराना हो चुका है। 1980 के दशक से बार एसोसिएशन और हाईकोर्ट बैंच संघर्ष समितियां लगातार संघर्ष कर रही हैं। हर महीने की 7 तारीख को अधिवक्ता न्यायिक कार्यों का बहिष्कार करते हैं। इसके अलावा धरना, प्रदर्शन, रैली, ज्ञापन और बंद जैसे आंदोलन वर्षों से जारी हैं। यह मुद्दा कई बार विधानसभा और संसद तक पहुंचा, लेकिन हर बार आश्वासन ही मिले। हाल ही में भी उदयपुर बार एसोसिएशन और संघर्ष समिति ने कोर्ट परिसर में धरना देकर सरकार से तत्काल बैंच स्थापना की मांग दोहराई।
आदिवासी अंचल को सबसे ज्यादा जरूरत
दक्षिण राजस्थान आदिवासी बहुल क्षेत्र है, जहां बड़ी संख्या में लोग आर्थिक रूप से कमजोर हैं। बांसवाड़ा, डूंगरपुर और प्रतापगढ़ जैसे जिलों के लोगों के लिए जोधपुर जाकर पैरवी करना बेहद कठिन होता है। अधिवक्ताओं का कहना है कि उदयपुर में हाईकोर्ट बैंच बनने से न केवल लोगों को सुलभ न्याय मिलेगा, बल्कि मामलों के त्वरित निस्तारण में भी मदद मिलेगी।
राजनीतिक समर्थन बहुत, निर्णय शून्य
चुनाव के समय लगभग हर राजनीतिक दल हाईकोर्ट बैंच की मांग का समर्थन करता है। कई सांसद, विधायक और जनप्रतिनिधि भी मंचों से इसकी पैरवी कर चुके हैं, लेकिन अब तक कोई निर्णायक पहल नहीं हो पाई। इससे मेवाड़-वागड़ क्षेत्र में लोगों में निराशा बढ़ रही है। अधिवक्ताओं का कहना है कि यदि लंबित मामलों की संख्या, भौगोलिक स्थिति, जनसंख्या और न्यायिक आवश्यकता को आधार बनाया जाए तो उदयपुर हाईकोर्ट बैंच की मांग पूरी तरह न्यायसंगत और व्यावहारिक है।
