दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में रचनाकारों ने लोकचेतना और साहित्य पर रखे विचार
उदयपुर, 27 सितंबर: राजस्थानी लोक संस्कृति, भाषा और साहित्य की समृद्ध परंपरा को विजयदान देथा ‘बिज्जी’ के कथा साहित्य में सजीव अभिव्यक्ति मिली है। उनके साहित्य में लोकजीवन, मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक सरोकारों का व्यापक चित्रण दिखाई देता है। यह विचार डॉ. देव कोठारी ने साहित्य अकादेमी एवं मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के राजस्थानी विभाग की ओर से आयोजित दो दिवसीय विजयदान देथा राष्ट्रीय संगोष्ठी में व्यक्त किए।
बप्पा रावल सभागार में आयोजित उद्घाटन सत्र में डॉ. कोठारी ने कहा कि ‘बिज्जी’ का कथा साहित्य राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर है। समापन समारोह में साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित कवि-आलोचक डॉ. गजेसिंह राजपुरोहित ने कहा कि देथा का कथा साहित्य लोकचित्त का आलोक है। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से आधुनिक राजस्थानी भाषा-साहित्य को व्यापक पहचान दिलाई।
संगोष्ठी में विभिन्न तकनीकी सत्रों में विजयदान देथा के उपन्यास, कथा साहित्य में संस्कृति, लोकोक्तियां, लोकगीत और दलित दृष्टि जैसे विषयों पर शोध-पत्र प्रस्तुत किए गए। कवि ज्योतिपुंज पण्डया ने देथा से जुड़े संस्मरण साझा किए। कार्यक्रम की शुरुआत प्रो. डॉ. अर्जुनदेव चारण ने दीप प्रज्ज्वलित कर की। विभागाध्यक्ष डॉ. सुरेश सालवी ने अतिथियों का स्वागत किया। शोधार्थियों, साहित्यकारों और साहित्य प्रेमियों ने सहभागिता की।