नदियां केवल जलधारा नहीं, सांस्कृतिक, सामाजिक और पारिस्थितिक धरोहर : डॉ. अनिल मेहता
उदयपुर, 27 सितंबर: नदियों को बचाने के लिए केवल नदी के प्रवाह क्षेत्र पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके जलग्रहण क्षेत्रों के जंगल, पहाड़ और प्राकृतिक तंत्र को संरक्षित करना जरूरी है। विश्व नदी दिवस के अवसर पर आयोजित नदी संवाद में विशेषज्ञों ने आयड़ सहित देश की नदियों के संरक्षण के लिए प्राकृतिक स्वरूप बनाए रखने पर जोर दिया।
झील-नदी विशेषज्ञ डॉ. अनिल मेहता ने कहा कि नदी किनारों को कंक्रीट से ढकने के बजाय प्राकृतिक हरित पट्टी विकसित करनी चाहिए। फ्लड प्लेन को निर्माण-मुक्त रखने और नदी पेटे को कंक्रीट से मुक्त करने से ही नदियां अपने मूल स्वरूप में लौट सकती हैं। उन्होंने कहा कि आयड़ को नाला बना देना उसके इतिहास, भूगोल और संस्कृति की उपेक्षा है। आयड़ के किनारे विकसित आहड़-बनास सांस्कृतिक परंपरा ताम्रपाषाण काल तक जाती है।
झील विकास प्राधिकरण के पूर्व सदस्य तेज शंकर पालीवाल ने कहा कि नदी के प्राकृतिक पाट को संकरा करने और पेटे को पक्का करने से समस्या का समाधान नहीं हुआ। सामाजिक कार्यकर्ता नंदकिशोर शर्मा ने रिवर फ्रंट के बजाय रिवर इकोसिस्टम को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता बताई। शिक्षाविद कुशल रावल ने आयड़ में आने वाले प्रदूषित जल के उपचार के लिए प्रकृति आधारित उपचार को प्राथमिकता देने की बात कही।