बेणेश्वर धाम से कांवड़ में पवित्र जल लाकर मंदारेश्वर महादेव का करते हैं जलाभिषेक, निभाते हैं ‘श्रावण वास’ की परंपरा
उदयपुर, 30 जुलाई : मेवाड़ और वागड़ के आदिवासी अंचलों में श्रावण मास केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आस्था, तप, प्रकृति संरक्षण और सामाजिक अनुशासन का जीवंत उत्सव है। झाड़ोल, कोटड़ा, गोगुंदा, ऋषभदेव, सलूम्बर, सराड़ा, डूंगरपुर और बांसवाड़ा सहित आदिवासी बहुल क्षेत्रों में हजारों परिवार ‘श्रावण वास’ का पालन करते हैं। इस दौरान सात्विक जीवन अपनाकर भगवान शिव, ग्राम देवता (देवरा) और लोक देवताओं की आराधना की जाती है।
श्रावण की सबसे विशिष्ट परंपराओं में बेणेश्वर धाम से पवित्र जल लेकर मंदारेश्वर महादेव तक कांवड़ यात्रा शामिल है। सदियों से चली आ रही इस परंपरा में आदिवासी श्रद्धालु कठिन पैदल यात्रा कर कांवड़ में लाया गया जल प्राकृतिक गुफा में विराजमान मंदारेश्वर महादेव के शिवलिंग पर अर्पित करते हैं। “हर-हर महादेव” और “बम-बम भोले” के जयघोष से गूंजती यह यात्रा श्रद्धा, तपस्या और अनुशासन का प्रतीक मानी जाती है। इसमें आदिवासी समाज के साथ अन्य समाजों के श्रद्धालु भी बड़ी संख्या में शामिल होकर सामाजिक समरसता का संदेश देते हैं।
श्रावण वास के दौरान आदिवासी परिवार मांस, मदिरा और अन्य सभी प्रकार के नशों का त्याग कर संयमित जीवन जीते हैं। प्रतिदिन स्नान-ध्यान, शिव पूजा, देवरा में सामूहिक आराधना और सोमवार के व्रत रखे जाते हैं। गांवों में अच्छी वर्षा, भरपूर फसल, पशुधन की वृद्धि और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए विशेष पूजा-अर्चना होती है।
प्रकृति की पूजा को मानते शिव आराधाना
आदिवासी संस्कृति में प्रकृति को देवतुल्य माना जाता है। इसलिए श्रावण में जंगलों, पहाड़ियों और जलस्रोतों की पूजा की जाती है, पौधारोपण किया जाता है और वृक्षों की रक्षा का संकल्प लिया जाता है। यही परंपरा शिव आराधना को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ती है। श्रावण के अंतिम दिनों में गांवों में भजन-कीर्तन, लोकगीत, सामूहिक पूजा और धार्मिक आयोजन होते हैं, जिनमें महिलाओं और युवाओं की सक्रिय भागीदारी इस सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचा रही है। डबोक के समीप नाहरमगरा निवासी नरेंद्र मीणा सहित कई आदिवासी लोगों से बातचीत की गई, जिनका कहना था कि उनका समुदाय प्रकृति की पूजा को ही शिव आराधना मानता है। उन्होंने बताया कि तनेसर महादेव मंदिर पर सैकड़ों आदिवासी श्रावण मास में नियमित खासकर सोमवार को पूजा के लिए जाते हैं।