उदयपुर में 43 से बढ़कर 47 जिला परिषद वार्ड, सलूंबर अलग जिला; वागड़ में एसटी आरक्षण बदलेगा सियासी समीकरण
उदयपुर, 5 अक्टूबर (सुभाष शर्मा): राजस्थान में पंचायतीराज चुनाव का कार्यक्रम घोषित होने के साथ ही गांवों की सियासत फिर गर्म हो गई है। जिला परिषद और पंचायत समिति सदस्यों के चुनाव चार चरणों में होंगे। मतदान 23 अक्टूबर, 29 अक्टूबर, 4 नवंबर और 14 नवंबर को होगा, जबकि मतगणना 20 नवंबर को होगी। इस बार प्रदेश की 41 जिला परिषदों के 1,403 सदस्य और 457 पंचायत समितियों के 8,245 सदस्य चुने जाएंगे। मेवाड़-वागड़ में 2020 के नतीजों की तुलना में इस बार परिसीमन, जिलों की सीमाओं और आरक्षण ने चुनावी गणित काफी बदल दिया है।
उदयपुर-चित्तौड़गढ़-राजसमंद में भाजपा मजबूत थी
वर्ष 2020 के जिला परिषद चुनाव में उदयपुर की 43 सीटों में भाजपा ने 27, कांग्रेस ने 15 और जनता सेना ने एक सीट जीती थी। यानी भाजपा को 62.8 प्रतिशत सीटें मिली थीं। चित्तौड़गढ़ में भाजपा ने 25 में से 21 और राजसमंद में 25 में से 17 सीटें जीती थीं। इसके उलट बांसवाड़ा में कांग्रेस ने 31 में से 20 सीटें जीतकर बढ़त बनाई थी। भाजपा को 10 और निर्दलीय को एक सीट मिली थी। प्रतापगढ़ में कांग्रेस ने 17 में से 9 और भाजपा ने 8 सीटें जीती थीं। डूंगरपुर में बीटीपी समर्थित निर्दलीयों ने 27 में से 13 सीटें जीती थीं, जबकि भाजपा को 8 और कांग्रेस को 6 सीटें मिली थीं।
उदयपुर का बदला गणित
2026 में पुराने परिणामों को सीधे वर्तमान चुनाव पर लागू करना संभव नहीं है। उदयपुर जिला परिषद में अब 47 वार्ड हैं, जबकि 2020 में 43 थे। जिले में 20 पंचायत समितियां और 590 ग्राम पंचायतें चुनाव प्रक्रिया में हैं। सबसे बड़ा बदलाव सलूंबर के अलग जिला बनने का है। ऐसे में 2020 के उदयपुर के 27 भाजपा और 15 कांग्रेस सदस्यों के आंकड़ों को मौजूदा उदयपुर पर सीधे लागू करना सही नहीं होगा।
आरक्षण से वागड़ में बदले समीकरण
बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़ और सलूंबर में सरपंच के सभी पद एसटी के लिए आरक्षित हैं। इन चार जिलों में कुल 1,253 सरपंच पद एसटी वर्ग के लिए आरक्षित किए गए हैं। जिला प्रमुख पदों पर भी आरक्षण का असर है। 41 जिलों में 20 जिला प्रमुख पद महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। उदयपुर और राजसमंद में जिला प्रमुख पद अनारक्षित हैं, जबकि सलूंबर व प्रतापगढ़ एसटी महिला तथा बांसवाड़ा व डूंगरपुर एसटी वर्ग के लिए आरक्षित हैं। चित्तौड़गढ़ में जिला प्रमुख पद सामान्य महिला के लिए आरक्षित है। ऐसे में 2020 में जिला परिषद की सीटों के जरिए प्रभाव बनाने वाले नेताओं के लिए इस बार वही सीट या पद उपलब्ध हो, यह जरूरी नहीं है। परिसीमन और आरक्षण ने प्रत्याशी चयन से लेकर जिला प्रमुख के चुनाव तक के समीकरण बदल दिए हैं। इसलिए 2020 के नतीजे इस चुनाव की पृष्ठभूमि जरूर हैं, लेकिन इस बार असली परीक्षा नए चुनावी नक्शे पर भाजपा, कांग्रेस और स्थानीय राजनीतिक ताकतों के प्रभाव की होगी।