आलोक संस्थान में 101 कन्याओं का पूजन-वंदन, शाष्टांग दंडवत प्रणाम कर किया नारी शक्ति का अभिनंदन
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नारी शक्ति के प्रति सम्मान ही कन्या पूजन का मूल उद्देश्य — डॉ. प्रदीप कुमावत
उदयपुर, 19 अक्टूबर: नवरात्रि के पावन अवसर पर आलोक संस्थान, हिरण मगरी स्थित व्यास सभागार में 101 कन्याओं का पूजन-वंदन कर नवदुर्गा की आराधना की गई। इस अवसर पर कन्याओं का विधि-विधान से पूजन, शृंगार, अंगुष्ठ पूजन, माल्यार्पण, उपहार अर्पण एवं आरती की गई। कार्यक्रम का विशेष आकर्षण यह रहा कि आलोक संस्थान के निदेशक श्री गुरु डॉ॰ प्रदीप कुमावत ने कन्याओं के चरणों का वंदन करते हुए उन्हें शाष्टांग दंडवत प्रणाम किया। इस भावपूर्ण आयोजन के माध्यम से नारी शक्ति के प्रति सम्मान, श्रद्धा और समर्पण का संदेश दिया गया।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डॉ. प्रदीप कुमावत ने कहा कि कन्या पूजन का उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान करना नहीं, बल्कि नारी शक्ति के प्रति अपनी श्रद्धा, सम्मान और सामाजिक उत्तरदायित्व को अभिव्यक्त करना है। भारतीय संस्कृति में नारी को शक्ति, सृजन, ज्ञान, समृद्धि और करुणा का प्रतीक माना गया है। नवरात्रि में माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना हमें यह संदेश देती है कि नारी केवल पूजनीय ही नहीं, बल्कि समाज और सृष्टि के संतुलन की आधारशिला भी है।
उन्होंने कहा कि भारतीय सनातन परंपरा में नारी शक्ति को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। जब-जब सृष्टि पर संकट आया, तब-तब देवी शक्ति ने विभिन्न स्वरूपों में प्रकट होकर संसार की रक्षा की। देवी अंबिका के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि सभी देवशक्तियों के एकत्रित स्वरूप से प्रकट हुई आदिशक्ति ने दुष्ट शक्तियों का संहार कर देवताओं और पृथ्वी लोक की रक्षा की। इसी प्रकार माँ बगलामुखी की आराधना भी शक्ति, संरक्षण और धर्म की स्थापना का संदेश देती है।
डॉ. कुमावत ने कहा कि नारी का सम्मान केवल नवरात्रि के नौ दिनों अथवा किसी एक दिन कन्या पूजन तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह सम्मान हमारे व्यवहार, परिवार, शिक्षा, सामाजिक व्यवस्था और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में दिखाई देना चाहिए। कन्याओं को समान अवसर देना, उनकी शिक्षा सुनिश्चित करना, उनकी सुरक्षा करना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना ही नारी वंदन की वास्तविक सार्थकता है।
रामायण के प्रसंग से समझाया नारी सम्मान का महत्व
डॉ. कुमावत ने रामायण के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय आदर्शों में नारी के प्रति सम्मान और मर्यादा को विशेष महत्व दिया गया है। भगवान श्रीराम और माता सीता के जीवन प्रसंग हमें पारिवारिक मर्यादा, पारस्परिक सम्मान और कर्तव्यबोध की प्रेरणा देते हैं। उन्होंने कहा कि समाज में नारी को सम्मानपूर्वक स्थान देना प्रत्येक व्यक्ति का नैतिक दायित्व है।
वेदोक्त मंत्रों से यज्ञ-हवन, 700 से अधिक आहुतियों से पवित्र हुआ वातावरण
कन्या पूजन से पूर्व वेदोक्त मंत्रों के साथ विधि-विधानपूर्वक यज्ञ-हवन किया गया। इसमें लगभग 700 आहुतियाँ अर्पित कर विश्व कल्याण, सुख-समृद्धि, शांति और सकारात्मक ऊर्जा की कामना की गई। वैदिक मंत्रोच्चार और धार्मिक अनुष्ठानों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। इसके पश्चात कन्याओं का पूजन-वंदन कर उन्हें मालाएँ एवं उपहार भेंट किए गए तथा आरती उतारी गई।
आलोक संस्थान की 16 वर्षों से चली आ रही परंपरा
आलोक संस्थान में कन्या पूजन एवं नारी शक्ति वंदन की यह परंपरा पिछले 16 वर्षों से निरंतर निभाई जा रही है। संस्थान का उद्देश्य नई पीढ़ी में भारतीय संस्कृति, वैदिक परंपराओं, संस्कारों और नारी सम्मान के मूल्यों का विकास करना है। संस्थान की इस पहल से प्रेरित होकर विभिन्न सामाजिक एवं अन्य संगठनों में भी कन्या पूजन और नारी सम्मान के कार्यक्रमों को प्रोत्साहन मिला है। इस आयोजन को वैदिक सांस्कृतिक परंपराओं के पुनर्जीवन और संस्कारों को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
आलोक फतेहपुरा में भी हुआ कन्या पूजन एवं यज्ञ
इसी क्रम में आलोक फतेहपुरा परिसर में भी कन्याओं का पूजन-वंदन किया गया तथा यज्ञ-हवन का आयोजन हुआ। दोनों स्थानों पर आयोजित कार्यक्रमों में श्रद्धा, भक्ति और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का वातावरण रहा। इन आयोजनों के माध्यम से विद्यार्थियों, अभिभावकों और समाज के लोगों को कन्याओं के प्रति सम्मान तथा भारतीय संस्कारों को जीवन में अपनाने का संदेश दिया गया।
कार्यक्रम में डॉ. प्रदीप कुमावत, वीरेंद्र पालीवाल, नारायण चौबीसा शशांक टांक सहित अनेक गणमान्यजन, अभिभावक परिषद के प्रतिनिधि एवं संस्थान से जुड़े लोगों ने सहभागिता की। अभिभावक परिषद की ओर से भी सम्मान व्यक्त किया गया।
आलोक संस्थान का यह आयोजन इस संदेश के साथ संपन्न हुआ कि कन्या पूजन तभी सार्थक है, जब प्रत्येक कन्या को सम्मान, सुरक्षा, शिक्षा और आगे बढ़ने के समान अवसर प्राप्त हों। भारतीय संस्कृति की शक्ति उसके संस्कारों में निहित है और इन संस्कारों को व्यवहार में उतारकर ही नारी सम्मान की परंपरा को सच्चे अर्थों में जीवंत रखा जा सकता है।

