जनगणना में मूल परंपराओं से जुड़े व्यक्तियों को ही एसटी में दर्ज करने की मांग: सांसद डॉ. मन्नालाल रावत
Share
उदयपुर, 23 मार्च : उदयपुर सांसद डॉ. मन्नालाल रावत ने संसद में नियम 377 के तहत वर्ष 2026-27 की जनगणना को लेकर महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया। उन्होंने आग्रह किया कि अनुसूचित जनजाति (एसटी) के कॉलम में केवल उन्हीं व्यक्तियों को शामिल किया जाए, जो अपनी मूल अस्मिता, आस्था, संस्कृति और रूढ़ी-परंपराओं के अनुरूप जीवन यापन कर रहे हैं।
सांसद डॉ. रावत ने कहा कि किसी भी समाज के विकास का आधार उसकी अस्मिता होती है। जब अस्मिता पर प्रश्नचिह्न लगता है, तो संवैधानिक रूप से पात्र व्यक्तियों की पहचान प्रभावित होती है, जिससे विकास प्रक्रिया भी बाधित होती है। उन्होंने विशेष रूप से जनजाति समाज के संदर्भ में इस स्थिति को गंभीर बताया।
उन्होंने बताया कि 1955 में पारित ‘प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स एक्ट’की धारा 3 के अनुसार आदिवासी हिंदू माने गए हैं, लेकिन विवाह और उत्तराधिकार संबंधी कानूनों में अस्पष्टता तथा विभिन्न न्यायिक निर्णयों के कारण भ्रम की स्थिति बनी हुई है। झारखंड में आदिवासी धर्मकोड की मांग को लेकर भी विवाद उत्पन्न हुआ है।
सांसद ने सुझाव दिया कि एसटी वर्ग की पात्रता तय करने के लिए 1951 की पहली जनगणना के पारिवारिक अभिलेखों को आधार बनाया जाए। उन्होंने कहा कि इससे देश के जनजातीय समुदायों के समुचित विकास में सहायता मिलेगी और ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना को मजबूती मिलेगी।
