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हरियाली अमावस्या: सवा सौ साल से कायम अनूठी परंपरा, दूसरे दिन पूरा मेला महिलाओं के नाम

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हरियाली अमावस्या: सवा सौ साल से कायम अनूठी परंपरा, दूसरे दिन पूरा मेला महिलाओं के नाम

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फाइल फोटो

‘सखियों के मेले’ में पुरुषों की नो एंट्री, सावन की हरियाली के बीच फतहसागर की पाल पर उमड़ता है उत्साह; 4 से 5 लाख तक पहुंचती है मेलार्थियों की संख्या
उदयपुर, 11 अगस्त
: झीलों की नगरी उदयपुर की पहचान सिर्फ झीलों और महलों से नहीं, बल्कि उन परंपराओं से भी है, जो एक सदी से अधिक समय बाद आज भी जीवंत हैं। हरियाली अमावस्या का मेला ऐसी ही मेवाड़ी विरासत है। सावन की हरियाली, फतहसागर की पाल और सहेलियों की बाड़ी के बीच लगने वाला यह मेला पहले दिन सभी के लिए खुला रहता है, लेकिन दूसरे दिन पूरा मेला महिलाओं के नाम हो जाता है। पुरुषों के प्रवेश पर रोक और महिलाओं के लिए विशेष दिन की यह परंपरा इसे देश के अनूठे मेलों में अलग पहचान देती है।
1898-99 से जुड़ा इतिहास, महारानी की इच्छा से बनी परंपरा
हरियाली अमावस्या मेले की शुरुआत को लेकर इतिहास में 1898 और 1899 दोनों वर्षों का उल्लेख मिलता है। प्रचलित मान्यता के अनुसार महाराणा फतह सिंह के समय फतहसागर झील के लबालब भरने की खुशी में मेले की शुरुआत हुई। कहा जाता है कि महाराणा अपनी महारानी चावड़ी के साथ झील पर पहुंचे थे। महारानी की इच्छा पर मेले का दूसरा दिन महिलाओं के लिए निर्धारित किया गया, जो आगे चलकर ‘सखियों का मेला’ कहलाया।
पहले दिन रौनक, दूसरे दिन सिर्फ सखियों का संसार
पहले दिन फतहसागर की पाल और सहेलियों की बाड़ी के आसपास झूले, दुकानें, खान-पान और पारंपरिक वस्तुओं के स्टॉल सजते हैं। दूसरे दिन नजारा पूरी तरह बदल जाता है। पारंपरिक परिधानों में सजी महिलाएं सहेलियों के साथ मेले में पहुंचती हैं। खरीदारी, झूले, खान-पान और आपसी मेल-मिलाप इस दिन को महिलाओं के विशेष उत्सव में बदल देते हैं।
सिर्फ मेला नहीं, महिलाओं को मिला अपना सामाजिक स्पेस
इस परंपरा की सबसे बड़ी खासियत केवल पुरुषों की ‘नो एंट्री’ नहीं है। यह उस दौर की सामाजिक सोच का भी उदाहरण है, जब महिलाओं के लिए सार्वजनिक आयोजनों में स्वतंत्र स्थान की कल्पना सहज नहीं थी। मेवाड़ में महिलाओं के लिए मेले का पूरा दिन निर्धारित होना आज भी महिला सामाजिक सहभागिता की ऐतिहासिक मिसाल माना जा सकता है।
उदयपुर की पहचान बन चुका आयोजन
हरियाली अमावस्या मेला अब सिर्फ मनोरंजन का अवसर नहीं, बल्कि मेवाड़ की लोक संस्कृति, सावन की परंपरा और रियासतकालीन विरासत का जीवंत दस्तावेज है। राजस्थान पर्यटन के अनुसार मेले में 4 से 5 लाख तक मेलार्थियों के पहुंचने का अनुमान है। यही भीड़ और दूसरे दिन महिलाओं की विशिष्ट भागीदारी इसे उदयपुर के सबसे खास सांस्कृतिक आयोजनों में शामिल करती है।

हरियाली अमावस्या मेले में ट्रैफिक डायवर्जन, कई मार्गों पर वाहनों की एंट्री बंद

हरियाली अमावस्या मेले को लेकर उदयपुर पुलिस ने यातायात और डायवर्जन व्यवस्था जारी की है। मेला 12 और 13 अगस्त को फतहसागर की पाल और सहेलियों की बाड़ी में आयोजित होगा। 13 अगस्त को केवल महिलाओं के लिए मेला रहेगा। बड़ी संख्या में लोगों की आवाजाही को देखते हुए यातायात पुलिस ने कई मार्गों पर वाहनों का प्रवेश प्रतिबंधित किया है।
इन मार्गों पर रहेगा प्रतिबंध
पहाड़ी बस स्टैंड, फतहपुरा चौराहा, अरावली वाटिका, देवाली तिराहा, आयुर्वेदिक चौराहा, शिक्षा भवन, दैत्यमगरी और रानी रोड सहित कई मार्गों पर वाहनों का आवागमन प्रतिबंधित रहेगा। रानी रोड-देवाली से फतहपुरा तथा महाकालेश्वर से आयुर्वेदिक चौराहा-अंबावगढ़ तक बसों का संचालन भी बंद रहेगा।
यहां होगी पार्किंग
चारपहिया वाहनों की पार्किंग फील्ड क्लब, लव-कुश स्टेडियम के पास, स्वरूप सागर पाल, पंचवटी चौराहा और नीमच माता पार्किंग में रहेगी। नाथद्वारा की ओर से आने वाले वाहन सेलिब्रेशन मॉल के पास लिंक रोड व 100 फीट रोड किनारे पार्क किए जाएंगे। पुलिस ने आमजन से मुख्य सड़कों पर वाहन पार्क नहीं करने और यातायात व्यवस्था में सहयोग की अपील की है। एम्बुलेंस, फायर ब्रिगेड और अन्य आपातकालीन वाहनों पर ये प्रतिबंध लागू नहीं होंगे।

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