लंपी रोग से ग्रस्त पशुओं का दूध उबालकर उपयोग किया जा सकता है
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पशुपालक भ्रांतियों से दूर रहें, संक्रमित पशुओं को स्वस्थ पशुओं से अलग रखें; बचाव के लिए टीकाकरण जरूरी
उदयपुर, 18 सितंबर: राजस्थान के कई क्षेत्रों में इन दिनों पशुओं, विशेषकर गोवंश में लंपी स्किन डिजीज के मामले सामने आ रहे हैं। इस बीच पशुपालकों में बीमारी को लेकर कई तरह की भ्रांतियां भी फैल रही हैं। पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान महाविद्यालय, नवानिया वल्लभनगर के पशु चिकित्सा जन स्वास्थ्य विभाग के सहायक आचार्य डॉ. सुरेंद्र छंगाणी ने स्पष्ट किया कि लंपी रोग से ग्रस्त पशु के दूध को उबालकर उपयोग में लिया जा सकता है।
डॉ. छंगाणी के अनुसार यह धारणा भी गलत है कि लंपी रोग होने पर पशु की मृत्यु निश्चित है। उन्होंने बताया कि इस रोग में पशुओं की मृत्यु दर करीब 1 से 5 प्रतिशत तक होती है और उचित प्रबंधन एवं उपचार से संक्रमित पशुओं को बचाया जा सकता है।
उन्होंने बताया कि लंपी से बचाव का टीका उपलब्ध है और पशुपालन विभाग की संस्थाओं में इसे निशुल्क लगाया जाता है। उन्होंने पशुपालकों से स्वस्थ पशुओं का टीकाकरण कराने की अपील की।
डॉ. छंगाणी ने कहा कि लंपी स्किन डिजीज पशुओं से मनुष्यों में फैलने वाला जूनोटिक रोग नहीं है। संक्रमित पशुओं के फफोलों के संपर्क में आने से यह रोग मनुष्यों में नहीं फैलता। उन्होंने पशुपालकों को संक्रमित पशुओं को स्वस्थ पशुओं से अलग रखने, साफ-सफाई बनाए रखने तथा मच्छर-मक्खियों से पशुओं को बचाने की सलाह दी।
उन्होंने कहा कि बीमारी के लक्षण दिखाई देने पर भयभीत होने के बजाय तत्काल निकटतम पशु चिकित्सालय या पशुपालन विभाग की संस्था से संपर्क करें।

