उदयपुर में आधुनिक सर्जरी की तैयारी, आयुर्वेद में 58 तरह के ऑपरेशन की अनुमति
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आरएनटी मेडिकल कॉलेज में रोबोटिक सर्जरी यूनिट होगी स्थापित, आयुर्वेद में पाइल्स-फिस्टुला जैसे ऑपरेशन तक सीमित दायरा; एनेस्थीसिया विशेषज्ञों और प्रशिक्षण की उपलब्धता भी चुनौती
उदयपुर, 17 अक्टूबर। चिकित्सा के क्षेत्र में सर्जरी की तकनीक तेजी से बदल रही है। एक ओर आरएनटी मेडिकल कॉलेज में अत्याधुनिक रोबोटिक सर्जरी यूनिट स्थापित करने की तैयारी है, जिससे जटिल ऑपरेशन अधिक सटीकता से करने और मरीजों को कम चीरे, कम रक्तस्राव व जल्द रिकवरी का लाभ मिलने की उम्मीद है। दूसरी ओर आयुर्वेद के शल्य चिकित्सा में स्नातकोत्तर डिग्रीधारी चिकित्सकों को 58 तरह की सर्जरी करने की अनुमति से जुड़ा प्रावधान चर्चा में है, लेकिन इनके क्रियान्वयन में प्रशिक्षण, एनेस्थीसिया विशेषज्ञों और संसाधनों की उपलब्धता अहम चुनौती बनी हुई है। दोनों व्यवस्थाओं के बीच अंतर यह है कि आधुनिक रोबोटिक सर्जरी में तकनीक और उपकरणों की भूमिका महत्वपूर्ण है, जबकि आयुर्वेद में शल्य चिकित्सा के दायरे और उसके व्यावहारिक क्रियान्वयन का सवाल प्रमुख है।
आरएनटी मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य एवं नियंत्रक डॉ. राहुल जैन के अनुसार, कॉलेज में अत्याधुनिक रोबोटिक सर्जरी यूनिट स्थापित की जाएगी। इसके लिए ऑपरेशन थिएटर कॉम्प्लेक्स में आवश्यक संसाधन विकसित किए जाएंगे। रोबोटिक सर्जरी में सर्जन कंसोल के माध्यम से उपकरणों को नियंत्रित करते हैं। इससे शरीर के भीतर सूक्ष्म और सटीक तरीके से ऑपरेशन करने में मदद मिलती है। इस तकनीक से मरीजों को कम चीरे, कम रक्तस्राव और जल्द स्वस्थ होने का लाभ मिल सकता है।
आयुर्वेद में 58 तरह की सर्जरी का प्रावधान
दूसरी ओर, आयुर्वेद के शल्य चिकित्सकों के लिए 58 प्रकार की सर्जरी की अनुमति से संबंधित प्रावधान है। हालांकि, उपलब्ध समाचार के अनुसार, व्यवहार में पाइल्स और फिस्टुला जैसे ऑपरेशन ही प्रमुखता से किए जा रहे हैं। उदयपुर के आयुर्वेद कॉलेज में पांच चिकित्सकों की टीम और एनेस्थीसिया की व्यवस्था का उल्लेख भी किया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, बिना पर्याप्त प्रशिक्षण और एनेस्थीसिया विशेषज्ञ के जटिल ऑपरेशन करना मरीजों की सुरक्षा के लिहाज से जोखिमपूर्ण हो सकता है।समाचार में आयुर्वेद विभाग के निदेशक डॉ. आनंद शर्मा के हवाले से बताया गया है कि सर्जरी शिविरों के लिए बजट बढ़ाया गया है। वहीं, डॉ. मोहित सहाय ने आयुर्वेद में संज्ञाहरण की औषधि उपलब्ध नहीं होने और मरीजों की सुरक्षा के लिए एलोपैथी पर निर्भरता का मुद्दा उठाया है।

