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बढ़ते पेंथर, घटती वन्यजीव विविधता: उदयपुर के सामने गहराता पर्यावरणीय संकट

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बढ़ते पेंथर, घटती वन्यजीव विविधता: उदयपुर के सामने गहराता पर्यावरणीय संकट

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असंतुलन : भोजन की कमी से गांवों और शहर की ओर बढ़ रही तेंदुओं की घुसपैठ, विशेषज्ञों ने चेताया
उदयपुर, 22 मई:
अरावली की गोद में बसे उदयपुर में बढ़ती पेंथर आबादी और घटती वन्यजीव विविधता अब बड़े पर्यावरणीय संकट का संकेत देने लगी है। अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस पर ग्रीन पीपल सोसायटी और वन विभाग की ओर से आयोजित संगोष्ठी में विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि यदि समय रहते प्राकृतिक खाद्य श्रृंखला को संतुलित नहीं किया गया, तो मानव-वन्यजीव संघर्ष और गंभीर हो सकता है।
विशेषज्ञों ने कहा कि उदयपुर क्षेत्र में फ्लोरल डायवर्सिटी यानी वनस्पति विविधता अभी भी पर्याप्त है, लेकिन फॉनल डाइवर्सिटी लगातार कमजोर होती जा रही है। जंगलों में चीतल, सांभर, खरगोश, जंगली सूअर और अन्य शिकार प्रजातियों की संख्या घटने से तेंदुए अब प्राकृतिक जंगल तंत्र की बजाय मानव-आधारित खाद्य स्रोतों पर निर्भर होने लगे हैं।
“हरियाली नहीं, पूरी जीवन-श्रृंखला जरूरी”
पर्यावरणविद प्रो. महेश शर्मा ने कहा कि आधिकारिक आंकड़ों में जिले में तेंदुओं की संख्या 130 बताई जाती है, जबकि सेवानिवृत्त वन अधिकारियों के अनुसार यह संख्या 700 से 1000 तक हो सकती है। उन्होंने बताया कि एक तेंदुए को सालभर में 40 से 50 बड़े शिकार की जरूरत होती है, जबकि उदयपुर के जंगल मुश्किल से 30-35 तेंदुओं का भार उठा पा रहे हैं।
वन अधिकारियों ने कहा कि गांवों और शहर की सीमाओं में पेंथर की बढ़ती आवाजाही, मवेशियों पर हमले और मानव मौतें इसी असंतुलन का परिणाम हैं। विशेषज्ञों ने चेताया कि यदि शिकार प्रजातियों और वन्यजीव विविधता के संरक्षण पर गंभीर प्रयास नहीं हुए, तो भविष्य में भय, असुरक्षा और संघर्ष की स्थिति और विकराल हो सकती है।

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