अभियंता: सपनों को धरातल पर उतारने वाला समाज का अनदेखा शिल्पी
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अभियंता दिवस आज : उदयपुर की झीलों से जावर की खदानों तक इंजीनियरिंग की गौरवशाली विरासत

भंवरलाल पांचाल
सेवानिवृत्त सहायक अभियंता
सिंचाई विभाग, राजस्थान
उदयपुर, 13 सितम्बर: समाज में अभियंता की आवश्यकता क्यों है? यह प्रश्न कभी न कभी हर व्यक्ति के मन में जरूर उठता है और संभवतः इंजीनियरों के जेहन में भी। डॉक्टर जीवन बचाता है, शिक्षक ज्ञान देता है, सैनिक देश की रक्षा करता है, किसान अन्न उपजाता है, वैज्ञानिक नई खोज करता है और प्रशासन तथा राजनीति व्यवस्था को दिशा देते हैं। इन सभी क्षेत्रों में योगदान के लिए समाज में सम्मान और पुरस्कारों की परंपरा है। अभियंता को शायद उतना सार्वजनिक सम्मान नहीं मिलता, लेकिन आधुनिक समाज की बुनियाद उसके बिना अधूरी है।
अभियंता केवल मशीन, इमारत या सड़क नहीं बनाता, बल्कि वह मनुष्य के सपनों को धरातल पर उतारने का काम करता है। जिस सड़क पर हम चलते हैं, जिस वाहन से यात्रा करते हैं, जिस मोबाइल से दुनिया से जुड़ते हैं और जिन सुविधाओं को हम सहज जीवन का हिस्सा मानते हैं, उनके पीछे अभियंता की सोच, गणना, तकनीकी दक्षता और अथक मेहनत होती है। वह विज्ञान और ज्ञान को व्यवहार में बदलकर समस्याओं का वास्तविक समाधान खोजता है।
भारत में इंजीनियरिंग के इस गौरव को नई पहचान देने वालों में भारत रत्न मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का नाम सर्वोपरि है। उनका जन्म 15 सितंबर 1860 को हुआ था। उन्होंने अपने ज्ञान और दूरदृष्टि से सिंचाई, बांध और औद्योगिक विकास के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किए। कृष्णराज सागर बांध सहित अनेक परियोजनाओं से उन्होंने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। मैसूर राज्य के मुख्य अभियंता और बाद में दीवान के रूप में भी उन्होंने उल्लेखनीय योगदान दिया। वर्ष 1955 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया। उनकी स्मृति में ही 15 सितंबर को देश में अभियंता दिवस मनाया जाता है।
यदि अभियंताओं के योगदान की बात उदयपुर के संदर्भ में करें तो यहां इसकी जड़ें आधुनिक इंजीनियरिंग शिक्षा से कहीं अधिक पुरानी दिखाई देती हैं। पहाड़ियों से घिरे उदयपुर में जल संरक्षण की अद्भुत व्यवस्था इसका प्रमाण है। पिछोला, फतेहसागर, बड़ी और गोवर्धन सागर जैसी झीलों को आपस में जोड़कर अतिरिक्त जल को उदयसागर तक पहुंचाने की व्यवस्था तत्कालीन तकनीकी समझ और दूरदृष्टि का उदाहरण है। राजसमंद और जयसमंद जैसी विशाल झीलें भी सदियों पुरानी जल प्रबंधन क्षमता की कहानी कहती हैं। यही जल संचयन व्यवस्था सूखे और अकाल के समय क्षेत्र के लिए जीवनदायिनी बनी।
इसी तरह जावर की खदानें प्राचीन तकनीकी कौशल की अनूठी मिसाल हैं। लगभग 2500 वर्ष पहले यहां जस्ते के खनन और उसके निष्कर्षण की तकनीक विकसित होना उस समय के तकनीकी ज्ञान की असाधारण उपलब्धि थी। आधुनिक दौर में यही विरासत विकसित होकर उदयपुर को विश्व के प्रमुख जस्ता उत्पादक क्षेत्रों में पहचान दिला रही है।
इसलिए अभियंता केवल निर्माणकर्ता नहीं, बल्कि विचार को आकार, कल्पना को संरचना और आवश्यकता को समाधान में बदलने वाला समाज का अनदेखा शिल्पी है। अभियंता दिवस ऐसे ही अनगिनत शिल्पियों के योगदान को पहचानने और सम्मान देने का अवसर है।

