मेवाड़-वागड़ की धरती पर बिखरी भगवान परशुराम की तपोभूमियां
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राजसमंद की गुफाओं से लेकर बांसवाड़ा-डूंगरपुर के वनांचल तक आज भी जीवित हैं भगवान परशुराम से जुड़ी आस्थाएं
उदयपुर, 18 अप्रैल: भगवान परशुराम को सनातन परंपरा में धर्मरक्षा, तप और पराक्रम का प्रतीक माना गया है। मेवाड़ और वागड़ की पर्वतीय एवं वनवासी भूमि में आज भी अनेक ऐसे तीर्थ स्थल मौजूद हैं, जहां भगवान परशुराम के तप, साधना और प्रवास की मान्यताएं पीढ़ियों से जीवित हैं। राजसमंद की पहाड़ियों से लेकर बांसवाड़ा, डूंगरपुर और प्रतापगढ़ के वनांचल तक फैले ये धार्मिक स्थल श्रद्धालुओं की आस्था के प्रमुख केंद्र बने हुए हैं।
मेवाड़ क्षेत्र में स्थित परशुराम महादेव गुफा मंदिर भगवान परशुराम से जुड़ा सबसे प्रमुख तीर्थ माना जाता है। अरावली पर्वतमाला के बीच स्थित इस गुफा मंदिर के बारे में मान्यता है कि भगवान परशुराम ने अपने फरसे से इस गुफा का निर्माण किया और यहां भगवान शिव की कठोर तपस्या की। प्राकृतिक गुफा में स्थापित शिवलिंग श्रद्धालुओं की विशेष आस्था का केंद्र है। श्रावण मास और परशुराम जयंती पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
बागड़ क्षेत्र के माही तट पर परशुराम तपस्थली को भी लोकमान्यता के आधार पर भगवान परशुराम की तपोभूमि माना जाता है। माही नदी के तटवर्ती वन क्षेत्रों में यह विश्वास है कि भगवान परशुराम ने यहां साधना की थी। यद्यपि इन स्थलों का ऐतिहासिक प्रमाण सीमित है, लेकिन स्थानीय समाज में इनका धार्मिक महत्व गहरा है।
डूंगरपुर-बांसवाड़ा सीमा पर स्थित बेणेश्वर धाम भी परशुराम से जुड़ी मान्यताओं के कारण प्रसिद्ध है। सोम, माही और जाखम नदियों के संगम पर स्थित इस तीर्थ के बारे में कहा जाता है कि भगवान परशुराम ने यहां तप और स्नान किया था। यह क्षेत्र आदिवासी आस्था का प्रमुख केंद्र है और यहां लगने वाला मेला दूर-दूर तक प्रसिद्ध है।
बांसवाड़ा जिले के प्राचीन अर्थूना मंदिर समूह में भी भगवान परशुराम से जुड़े मंदिर और लोकश्रुतियां प्रचलित हैं। यह क्षेत्र प्राचीनकाल से शैव और वैष्णव साधना का केंद्र रहा है, जिससे परशुराम उपासना की परंपरा भी यहां मजबूत मानी जाती है।
प्रतापगढ़ जिले के सीतामाता अभयारण्य और जाखम नदी के आसपास के क्षेत्रों को भी ऋषियों की तपस्थली माना जाता है। स्थानीय परंपराओं के अनुसार भगवान परशुराम ने इन वन क्षेत्रों में तपस्या की थी। प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक वातावरण के कारण ये स्थल धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं।
मेवाड़ और वागड़ में भगवान परशुराम से जुड़े ये तीर्थ स्थल न केवल धार्मिक आस्था के केंद्र हैं, बल्कि इस क्षेत्र की प्राचीन ऋषि परंपरा और सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक भी हैं। परशुराम जयंती जैसे अवसरों पर यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है और सदियों पुरानी आस्थाएं पुनः जीवंत हो उठती हैं।
