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दूर होकर भी महासागरों से जुड़ा है उदयपुर

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दूर होकर भी महासागरों से जुड़ा है उदयपुर

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विश्व महासागर दिवस की पूर्व संध्या पर संवाद
उदयपुर, 7 जून:
झील से नदी, नदी से सागर और सागर से बादल—जल का यह अनवरत चक्र बताता है कि महासागर हमारे जीवन के अभिन्न अंग हैं। यदि हम अपनी झीलों, तालाबों और नदियों को स्वच्छ, सुरक्षित और जीवंत बनाए रखें तो महासागरों को स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। यह विचार विश्व महासागर दिवस की पूर्व संध्या पर आयोजित संवाद में झील प्रेमियों, पर्यावरणविदों और शिक्षाविदों ने व्यक्त किए।
विद्या भवन पॉलिटेक्निक के प्राचार्य डॉ. अनिल मेहता ने कहा कि भारतीय पर्यावरण चिंतन में प्रकृति का कोई भी अंग नहीं है।
प्रतिदिन पृथ्वी को स्पर्श करने से पूर्व उच्चारित श्लोक, “समुद्र-वसने देवि, पर्वत-स्तन-मण्डले। विष्णु-पत्नि नमस्तुभ्यं, पादस्पर्शं क्षमस्व मे॥”, यह स्मरण कराता है कि पर्वत, नदियाँ, झीलें और महासागर एक ही जीवनदायिनी जल-व्यवस्था के अंग हैं।
मेहता ने कहा कि उदयपुर भारत की जल-विभाजक रेखा पर स्थित है। माही और साबरमती बेसिन से हमारा जल अरब सागर और बनास बेसिन से हिंद महासागर तक पहुंचता है। उदयपुर के स्थानीय जल स्रोतों का संरक्षण करना वैश्विक महासागरीय स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए जरूरी है।
झील विकास प्राधिकरण के पूर्व सदस्य तेज शंकर पालीवाल ने कहा कि महासागर वैश्विक जलवायु को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। महासागर मानवजनित कार्बन डाइऑक्साइड का एक बड़ा हिस्सा अवशोषित करते हैं और पृथ्वी पर उत्पन्न अतिरिक्त ऊष्मा को भी अपने भीतर समाहित करते हैं। निरंतर चल रहे युद्धों से महासागरों का स्वास्थ्य खराब हो रहा है। इसका दुष्प्रभाव पूरे विश्व पर, उदयपुर जैसे इलाकों पर भी आयेगा।
सामाजिक चिंतक नंदकिशोर शर्मा ने कहा कि महासागरीय प्रदूषण की शुरुआत हमारे घरों, मोहल्लों, झीलों और नदी नदियों से होती है। प्लास्टिक, सीवेज तथा रासायनिक प्रदूषण नदियों के रास्ते समुद्र तक पहुंचता है।
शिक्षाविद कुशल रावल ने कहा कि उदयपुर की आयड़ नदी को उसके प्राकृतिक स्वरूप में पुनर्जीवित करना केवल स्थानीय रूप सेअहतवपूर्ण नहीं वरन वैश्विक जल-परिस्थितिकी के प्रति हमारी जिम्मेदारी का भी प्रतीक है।
वरिष्ठ नागरिक द्रुपद सिंह तथा युवा पर्यावरण प्रेमी विनोद कुमावत ने कहा कि विश्व महासागर दिवस उन सभी नागरिकों का दिवस है जो जल चक्र से जुड़े हैं। समुद्र से हजारों किलोमीटर दूर रहने वाला व्यक्ति भी अपनी जल-उपयोग की आदतों में सुधार, कचरा प्रबंधन और जल स्रोतों के संरक्षण के से महासागरों की सेवा कर सकता है।

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