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उदयपुर का जल प्रबंधन मॉडल बना राष्ट्रीय उदाहरण

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उदयपुर का जल प्रबंधन मॉडल बना राष्ट्रीय उदाहरण

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विश्व जल दिवस विशेष: झीलों की इंटरलिंकिंग से सीख, शहरीकरण बना नई चुनौती
उदयपुर, 21 मार्च (सुभाष शर्मा):
हर साल 22 मार्च को मनाए जाने वाले वर्ल्ड वॉटर डे के अवसर पर जल संरक्षण और सतत प्रबंधन की जरूरत एक बार फिर केंद्र में है। इस वर्ष की थीम ‘जल एवं लैंगिक समानता’ है, जो जल प्रबंधन में महिलाओं की भागीदारी और समान अवसरों पर बल देती है। ऐसे समय में उदयपुर का सदियों पुराना जल प्रबंधन मॉडल देशभर के लिए प्रेरणास्रोत बनकर उभर रहा है।


गुजरात की अर्बन-रूरल प्लानिंग विशेषज्ञ श्रिया पांचाल के अनुसार उदयपुर में प्राचीन काल में विकसित झीलों और तालाबों की इंटरलॉकिंग प्रणाली आज भी प्रासंगिक है। श्रिया पांचाल बताती हैं कि पिछोला झील, फतेहसागर झील, स्वरूप सागर, गोवर्धन सागर और उदयसागर झील सहित करीब 44 जल स्रोतों को इस तरह जोड़ा गया है कि एक झील के भरते ही अतिरिक्त पानी स्वतः अन्य झीलों में प्रवाहित हो जाता है। यह व्यवस्था आधुनिक ‘नदी जोड़ो’ परियोजनाओं से भी अधिक प्रभावी मानी जाती है।
इतिहास में दूरदर्शिता की मिसाल
इतिहास बताता है कि मेवाड़ के शासकों ने वर्षा जल संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। चित्तौड़गढ़ किला में मौजूद 84 जल संरचनाएं इस दूरदर्शिता का प्रमाण हैं, जिन्हें युद्धकालीन जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित किया गया था।
शहरीकरण से बढ़ता दबाव
हालांकि, वर्तमान में तेजी से बढ़ते शहरीकरण, अतिक्रमण और बढ़ती जल मांग के कारण यह पारंपरिक प्रणाली दबाव में है। देवास परियोजना के माध्यम से बाहरी जल स्रोतों से आपूर्ति की जा रही है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि मूल जल स्रोतों का संरक्षण ही स्थायी समाधान है।
संरक्षण ही भविष्य की कुंजी
विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि झीलों के कैचमेंट क्षेत्र और पारंपरिक संरचनाओं की सुरक्षा नहीं की गई, तो भविष्य में जल संकट गहरा सकता है। ऐसे में विश्व जल दिवस केवल जागरूकता का प्रतीक नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई का आह्वान भी है।

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