14 वर्षों में बदली राजस्थान विद्यापीठ की तस्वीर
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बंद होने की कगार से ‘नैक ए ग्रेड’ तक पहुंचाया
कुलपति कर्नल प्रो. एस.एस. सारंगदेवोत का दावा- छात्र संख्या 2,148 से बढ़कर 11 हजार पार, 5 से 70 से अधिक हुए कोर्स; डबोक में वेटरनरी कॉलेज और 400 बेड मेडिकल कॉलेज की तैयारी
उदयपुर, 10 जुलाई (ओमपाल): कभी मान्यता संकट, घटती छात्र संख्या और आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ (डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी) अब ‘नैक ए ग्रेड’ हासिल कर नई पहचान बना चुका है। वर्ष 2012 में बंद होने की कगार पर खड़े विश्वविद्यालय की कमान संभालने वाले कुलपति कर्नल प्रो. एस.एस. सारंगदेवोत का दावा है कि बीते 14 वर्षों में संस्थान ने शैक्षणिक, वित्तीय और आधारभूत ढांचे के स्तर पर व्यापक परिवर्तन किया है। छात्र संख्या 2,148 से बढ़कर 11 हजार से अधिक हो गई है, जबकि पांच पाठ्यक्रमों तक सीमित विश्वविद्यालय में अब 70 से अधिक कोर्स संचालित हो रहे हैं।

पुनर्निर्माण से आत्मनिर्भरता तक का सफर
कुलपति प्रो. सारंगदेवोत ने विशेष बातचीत में बताया कि वर्ष 2012 में विश्वविद्यालय की मान्यता पर संकट था और संस्थान 90 प्रतिशत सरकारी अनुदान पर निर्भर था। योजनाबद्ध तरीके से रोजगारपरक पाठ्यक्रम शुरू किए गए, नए गर्ल्स कॉलेज खोले गए और अकादमिक विस्तार किया गया। आज विश्वविद्यालय अपनी 90 प्रतिशत आवश्यकताएं स्वयं के संसाधनों से पूरी कर रहा है।
स्वास्थ्य और शिक्षा के नए प्रोजेक्ट
उन्होंने बताया कि डबोक परिसर में 100 बेड का आधुनिक अस्पताल संचालित है, जहां आईसीयू और ऑपरेशन थिएटर की सुविधाएं उपलब्ध हैं। जल्द ही यहां वेटरनरी कॉलेज शुरू किया जाएगा। साथ ही 400 बेड के मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल तथा आयुर्वेदिक कॉलेज की स्थापना की दिशा में भी काम किया जा रहा है।
‘कर्नल’ की मानद उपाधि पर बोले
प्रो. सारंगदेवोत ने बताया कि बचपन में सेना में जाकर देश सेवा करने का सपना था। शिक्षा के क्षेत्र में योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने 28 अप्रैल, 2017 को उन्हें ‘कर्नल’ की मानद उपाधि से सम्मानित किया।
कर्मचारियों की हड़ताल पर क्या कहा?
पिछले 35 दिनों से जारी कर्मचारियों की हड़ताल पर उन्होंने कहा कि संवाद के जरिए समाधान निकलेगा, लेकिन आंदोलन लोकतांत्रिक मर्यादाओं और अनुशासन के दायरे में होना चाहिए।
युवाओं के नाम संदेश
उन्होंने कहा कि देश की सबसे बड़ी ताकत युवा हैं। युवाओं को केवल डिग्री नहीं, बल्कि चरित्र, अनुशासन और सामाजिक संवेदनशीलता भी विकसित करनी चाहिए। मजबूत राष्ट्र निर्माण के लिए संस्कारवान और जिम्मेदार युवाओं की आवश्यकता है।
“हमने एक संघर्षरत विश्वविद्यालय को नई पहचान दी है। हमारी सबसे बड़ी पूंजी हमारे विद्यार्थी, शिक्षक और कर्मचारी हैं। शिक्षा केवल ज्ञान नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन का माध्यम है।”
— कर्नल प्रो. एस.एस. सारंगदेवोत, कुलपति, राजस्थान विद्यापीठ
