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आस्था, स्थापत्य और शौर्य का प्रतीक है उदयपुर का जगदीश मंदिर

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आस्था, स्थापत्य और शौर्य का प्रतीक है उदयपुर का जगदीश मंदिर

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374वें पाटोत्सव पर जीवंत हुआ इतिहास, स्वप्न संकेत से लेकर बलिदान तक की गौरवगाथा
उदयपुर, 30 अप्रैल :
उदयपुर के मध्य स्थित जगदीश मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि मेवाड़ की आस्था, स्थापत्य कला और बलिदान की विरासत का अद्भुत प्रतीक है। 374वें पाटोत्सव के अवसर पर मंदिर का गौरवशाली इतिहास फिर श्रद्धालुओं और इतिहास प्रेमियों के बीच चर्चा का केंद्र बना हुआ है। मान्यता है कि मेवाड़ के महाराणा जगत सिंह प्रथम को भगवान जगन्नाथ ने स्वप्न में दर्शन देकर उदयपुर में अपना धाम बनाने का आदेश दिया था। इसी दिव्य संकेत के बाद वर्ष 1651 में इस भव्य मंदिर की स्थापना हुई, जो आज भी मेवाड़ की सांस्कृतिक पहचान बना हुआ है।
पत्थरों में उकेरी गई भक्ति और कला
जगदीश मंदिर की वास्तुकला मेवाड़ की कलात्मक समृद्धि का उत्कृष्ट उदाहरण है। ऊंचे चबूतरे पर बने इस मंदिर तक पहुंचने के लिए 32 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। विशाल स्तंभों, अलंकृत दीवारों और बारीक नक्काशी में हाथी, घोड़े, नर्तक और पौराणिक कथाओं के दृश्य उकेरे गए हैं। गर्भगृह में स्थापित भगवान जगदीश की चतुर्भुज प्रतिमा श्रद्धा का केंद्र है, जबकि परिसर में बने अन्य छोटे मंदिर इसकी आध्यात्मिक गरिमा को और बढ़ाते हैं।
मंदिर की रक्षा में दिया था बलिदान
जगदीश मंदिर केवल भक्ति का केंद्र नहीं रहा, बल्कि संघर्ष का भी साक्षी है। मुगल काल में हुए हमले के दौरान मंदिर की रक्षा के लिए नरू बारहठ और उनके साथियों ने बलिदान दिया था। यह मंदिर आज भी उस साहस और श्रद्धा की कहानी कहता है। वैशाख पूर्णिमा पर आयोजित पाटोत्सव में विशेष पूजा, श्रृंगार और ध्वजारोहण के साथ श्रद्धालु इस ऐतिहासिक धरोहर के प्रति अपनी आस्था प्रकट करते हैं।

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